Tuesday, May 17, 2011
प्लेयर्स लाउंज से मैच देखना
क्रिकेट मैच और मुझमें पूर्व जन्म का बैर है। क्रिकेट मेरा पसंदीदा खेल भी नहीं है, फिर भी मैच के बहाने स्टेडियम जाना, मुझे अच्छा लगता है। सच कहूं तो स्टेडियम जाकर मुझे खेल और खिलाडिय़ों से अधिक दर्शक और उनकी प्रतिक्रियाएं देखना अच्छा लगता है, लेकिन क्या करूं, जब भी मेरे आसपास के स्टेडियम में क्रिकेट मैच होता है, मैं ऐसा व्यस्त हो जाता हूं कि पास और टिकट बेकार पड़े रह जाते हैं। मैं स्टेडियम नहीं पहुंच पाता। बच्चे और स्टाफ मैच का आनंद लेते हैं। इसके बावजूद, मैंने पिछले 11 वर्षों में मोहाली में दो अंतरराष्ट्रीय मैच और जयपुर में आईपीएल- 4 का एक मैच देख ही लिया।
मैच देखकर निकलने के बाद हर बार मुझे लगा कि मैच देखने का मजा कॉरपोरेट या प्लेयर्स लाउंज में ही है। मुझे कॉरपोरेट से ज्यादा प्लेयर्स लाउंज पसंद है। यहां खिलाडिय़ों को पास से देखने- सुनने का मौका मिलता है। सेलिब्रिटीज से मुलाकात होती है। खाना-पीना मुफ्त रहता है। मौसम अनुकूलित रहता है। चेयर्स आरामदायक होती हैं। कुशन वाली चेयर्स तो होती ही हैं, ऊंची घूमने वाली बार चेयर्स भी होती हैं। इन चेयर्स पर बैठकर मैच देखने का मजा ही अलग है। एक शब्द में कहें तो प्लेयर्स लाउंज में फाइव स्टार फेसिलिटीज होती हैं। सबसे बड़ी बात, प्लेयर्स लाउंज में बैठे दर्शक इतने खास होते हैं कि आपको मैच देखने का मौका ही नहीं देते। आप उन्हीं में व्यस्त रहते हैं और मैच खतम हो जाता है। यानी मैच रोमांचक हो या सामान्य। अच्छा या हो खराब। प्लेयर्स लाउंज, आपके बोर नहीं होने की गारंटी है।
आईपीएल मौज मस्ती का खेल है। इसमें अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट जैसी संजीदगी नहीं होती। इसलिए आईपीएल के मैचों को देखने का मजा अलग है। मैदान में डीजे का शोर रहता है। स्थानीय वेषभूषा में चीयरलीडर्स होती हैं। मैच के साथ नाच- गाने का लुत्फ मिलता है। फोटो खिंचवाकर एक घंटे में प्रिंट मिल जाता है। तमाम तरह के स्टीकर मुफ्त मिलते हैं। अनलिमिटेड ड्रिंक्स और स्नैक्स फ्री होता है। फैशन आईक्यू अपडेट हो जाता है। और सबसे बड़ी बात, समय, संदर्भ और परिवर्तन की धारा समझ में आ जाती है।
इसी कारण मई की गर्मी में हम राजस्थान रॉयल्स और पुणे वारियर्स के बीच टी- 20 मैच देखने जयपुर पहुंचे। मैदान पर शेरवार्न, राहुल द्रविड़, युवराज, रॉस टेलर, मुरली कार्तिक, जोहान बोथा, रॉबिन उथप्पा जैसे खिलाड़ी माहौल को गर्म करने की कोशिश कर रहे थे तो दर्शकों में बैठी शमिता शेट्टी, नेहा धूपिया और लिज हर्ले जैसी सेलिब्रिटीज माहौल को खुशनुमा बनाए हुए थीं। इन्हीं के बीच अरबाज खान भी बैठे थे।
प्लेयर्स लाउंज के दर्शकों की भीड़ इन सेलिब्रिटीज से अधिक सुंदर और दर्शनीय थी। गरमी ने दोनों पर अलग- अलग असर डाल रखा था। जयपुर की गरमी को देखते हुए उक्त सेलिब्रिटीज जहां पूरा शरीर छिपाने वाले कपड़े पहने थीं, वहीं दर्शकों की भीड़ ने शरीर के कुछ अंग ढंकने मात्र के कपड़े पहन रखे थे। उनका पूरा खुला शरीर उनके साथ- साथ दूसरों को भी ठंडक पहुंचा रहा था। इसलिए प्लेयर्स लाउंज का मौसम ठंडा और सुहाना था।
डीजे की तेज धुन पर इन दर्शकों के नाच- गाने किसी नाइट क्लब का अहसास करा रहे थे। लोग मैच से ज्यादा देह दर्शन में डूबे रहे। इसीलिए मैच खतम होना सभी को खला। सभी एकाएक बोल पड़े- अरे, इतनी जल्दी खतम हो गया। कौन जीता? सभी आश्चर्यचकित थे कि राजस्थान रॉयल्स मैच जीत गई। बहरहाल, आपको भी इतने मुफ्त फायदों के साथ मैच देखना हो तो प्लेयर्स लाउंज से ही मैच देखिएगा। आनंद आता है।
Thursday, May 12, 2011
अपने शहर के वरिष्ठजनों के सामने मंच पर बैठना
मेरे अनुभव मुझे बताते रहे हैं कि मंचासीन होकर अपनी बात कहना बेहद सरल कार्य है, लेकिन वर्षों का यह मेरा अनुभव एक दिन गलत साबित हुआ। उस दिन मैंने महसूस किया कि मंच पर बैठकर आप सारी दुनिया को ज्ञान दे सकते हैं, लेकिन अपने शहर में वरिष्ठ लोगों के सामने मंच पर बैठकर बोलना, बहुत कठिन होता है। यही नहीं, उससे भी कठिन होता है कि उन्हें सम्मानित करना। यह मैंने उस दिन अनुभव किया, जिस दिन इलाहाबाद के वरिष्ठ रंगकर्मियों को सम्मानित करने के कार्यक्रम में उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र (एनसीजेडसीसी) ने मुझे विशिष्ट अतिथि बनाया। इस सम्मान समारोह के मुख्य अतिथि इलाहाबाद मंडल के कमिश्नर मुकेश मेश्राम थे।
नगर के रंगकर्मियों से सांस्कृतिक केन्द्र का सभागार भरा था। सांस्कृतिक केन्द्र ने सम्मान के लिए इलाहाबाद के रंगकर्मियों में सर्वश्री सचिन तिवारी, लल्लन सिंह गहमरी, अजित पुष्कल, दमयंती रैना, रामगोपाल, रामचंद्र गुप्ता, सुरेन्द्र जी और शास्त्रीय संगीत के सुप्रसिद्ध हस्ताक्षर शांताराम कशालकर को चुना था। यह सम्मान एक तरह का लाइफ टाइम एचीवमेंट एवार्ड जैसा था। इलाहाबाद के इन सभी रंगकर्मियों ने रंगमंच के लिए अपनी सीमाओं से ज्यादा काम किया है। यही कारण है कि इनमें से अधिकांश की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर है। इलाहाबाद के सितारे तो यह हैं हीं।
सम्मानित होने वाले सभी वरिष्ठ रंगकर्मी पहली पंक्ति में बैठे थे। नए और पुराने रंगकर्मी उन्हें घेरे थे। पुराने संदर्भों को हल्के फुल्के ढंग से उठाया जा रहा था। प्रस्तुतियों के संस्मरण सुने सुनाए जा रहे थे। इस अनौपचारिक बातचीत में सभागार में उपस्थित अनेक नाट्यप्रेमी भी शामिल थे। अस्वीकृतियों के शहर के इस नए रूप पर मैं मुग्ध था। इलाहाबाद की पहचान व्यंग्य और कटुक्तियों की जगह पूरा वातावरण प्रशंसात्मक भाव से भरा था। दो इलाहाबादियों के परस्पर विरोधी पांच विचार, वाले इस शहर में ऐसा उल्लासपूर्ण आयोजन शायद पहली बार हो रहा था। मेरी उम्र के और मुझसे बाद की पीढ़ी के तमाम रंगकर्मी, सांस्कृतिक केन्द्र के निदेशक आनंद वर्धन शुक्ला की इस बात के लिए प्रशंसा कर रहे थे कि उनके नेतृत्व में सांस्कृतिक केन्द्र ने यह सराहनीय आयोजन किया।
कार्यक्रम के प्रारंभ में आज के रंगकर्म पर चर्चा हुई। चर्चा में अतुल यदुवंशी, डॉ. अनुपम आनंद और अनिल रंजन भौमिक ने विचार व्यक्त किए। अतुल ने रंगकर्म के लोक से, डॉ. अनुपम आनंद ने जीवन से और अनिल रंजन ने सरोकारों से कटते जाने पर चिंता व्यक्त की। अंत में चयनित वरिष्ठ रंगकर्मियों को हमने बुके देकर और शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया। सम्मानित रंगकर्मियों को रंगकर्म में उनकी सराहनीय सेवाओं के लिए प्रशस्ति पत्र भी दिया गया। सांस्कृतिक केन्द्र के निदेशक आनंद वर्धन शुक्ल ने प्रारंभ में सभी का स्वागत और अंत में सभी के प्रति आभार व्यक्त किया। निसंदेह, अपने शहर के उन वरिष्ठ रंगकर्मियों को सम्मानित करना, जिनसे मैंने बहुत कुछ जाना और सीखा है, मेरे लिए गौरवपूर्ण और कभी न भुलाया जा सकने वाला अनुभव रहा। यह अवसर प्रदान करने के लिए सांस्कृतिक केन्द्र के निदेशक आनंद वर्धन शुक्ला का मैं ह्रदय से आभारी हूं।
मंच पर उपस्थित इलाहाबाद के सम्मानित किए गए वरिष्ठ रंगकर्मियों के साथ मेरा, कमिश्नर मुकेश मेश्राम और निदेशक आनंद वर्धन शुक्ल का समूह चित्र नीचे देखिए :-
नगर के रंगकर्मियों से सांस्कृतिक केन्द्र का सभागार भरा था। सांस्कृतिक केन्द्र ने सम्मान के लिए इलाहाबाद के रंगकर्मियों में सर्वश्री सचिन तिवारी, लल्लन सिंह गहमरी, अजित पुष्कल, दमयंती रैना, रामगोपाल, रामचंद्र गुप्ता, सुरेन्द्र जी और शास्त्रीय संगीत के सुप्रसिद्ध हस्ताक्षर शांताराम कशालकर को चुना था। यह सम्मान एक तरह का लाइफ टाइम एचीवमेंट एवार्ड जैसा था। इलाहाबाद के इन सभी रंगकर्मियों ने रंगमंच के लिए अपनी सीमाओं से ज्यादा काम किया है। यही कारण है कि इनमें से अधिकांश की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर है। इलाहाबाद के सितारे तो यह हैं हीं।
सम्मानित होने वाले सभी वरिष्ठ रंगकर्मी पहली पंक्ति में बैठे थे। नए और पुराने रंगकर्मी उन्हें घेरे थे। पुराने संदर्भों को हल्के फुल्के ढंग से उठाया जा रहा था। प्रस्तुतियों के संस्मरण सुने सुनाए जा रहे थे। इस अनौपचारिक बातचीत में सभागार में उपस्थित अनेक नाट्यप्रेमी भी शामिल थे। अस्वीकृतियों के शहर के इस नए रूप पर मैं मुग्ध था। इलाहाबाद की पहचान व्यंग्य और कटुक्तियों की जगह पूरा वातावरण प्रशंसात्मक भाव से भरा था। दो इलाहाबादियों के परस्पर विरोधी पांच विचार, वाले इस शहर में ऐसा उल्लासपूर्ण आयोजन शायद पहली बार हो रहा था। मेरी उम्र के और मुझसे बाद की पीढ़ी के तमाम रंगकर्मी, सांस्कृतिक केन्द्र के निदेशक आनंद वर्धन शुक्ला की इस बात के लिए प्रशंसा कर रहे थे कि उनके नेतृत्व में सांस्कृतिक केन्द्र ने यह सराहनीय आयोजन किया।
कार्यक्रम के प्रारंभ में आज के रंगकर्म पर चर्चा हुई। चर्चा में अतुल यदुवंशी, डॉ. अनुपम आनंद और अनिल रंजन भौमिक ने विचार व्यक्त किए। अतुल ने रंगकर्म के लोक से, डॉ. अनुपम आनंद ने जीवन से और अनिल रंजन ने सरोकारों से कटते जाने पर चिंता व्यक्त की। अंत में चयनित वरिष्ठ रंगकर्मियों को हमने बुके देकर और शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया। सम्मानित रंगकर्मियों को रंगकर्म में उनकी सराहनीय सेवाओं के लिए प्रशस्ति पत्र भी दिया गया। सांस्कृतिक केन्द्र के निदेशक आनंद वर्धन शुक्ल ने प्रारंभ में सभी का स्वागत और अंत में सभी के प्रति आभार व्यक्त किया। निसंदेह, अपने शहर के उन वरिष्ठ रंगकर्मियों को सम्मानित करना, जिनसे मैंने बहुत कुछ जाना और सीखा है, मेरे लिए गौरवपूर्ण और कभी न भुलाया जा सकने वाला अनुभव रहा। यह अवसर प्रदान करने के लिए सांस्कृतिक केन्द्र के निदेशक आनंद वर्धन शुक्ला का मैं ह्रदय से आभारी हूं।
मंच पर उपस्थित इलाहाबाद के सम्मानित किए गए वरिष्ठ रंगकर्मियों के साथ मेरा, कमिश्नर मुकेश मेश्राम और निदेशक आनंद वर्धन शुक्ल का समूह चित्र नीचे देखिए :-
Monday, May 9, 2011
आप्त वचन
किस्मत, बलात्कार की तरह अयाचित होती है। आप इससे जूझिए या फिर इसका आनंद लेना सीख लीजिए।
एक बच्चे का जन्म आपको अभिभावक बनाता है तो दूसरे बच्चे का रेफरी।
पद और पोजिशन, ग्रुप सेक्स की तरह होता है। आपके पीछे 10 लोग आपकी जगह लेने को तैयार खड़े रहते हैं।
विवाह ऐसा संबंध हैं, जिसमें एक व्यक्ति हमेशा सही होता है और दूसरा पति होता है।
शिक्षा, वेश्या की तरह होती है। यह पैसा और कड़ी मेहनत दोनों मांगती है।
आप प्यार खरीद नहीं सकते, फिर भी आपको इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है।
सफलता, गर्भ धारण जैसी होती है। आपको सभी बधाई देते हैं लेकिन यह कोई नहीं पूछता कि इसके लिए आप कितने लुटे- पिटे।
वैवाहिक जीवन में पति और पत्नी दोनों को समझौता करना पड़ता है, पति को हमेशा मानना पड़ता है कि वह गलत है और पत्नी को हमेशा पति की इस बात पर हां कहना पड़ता है।
भाषा को सारी दुनिया में मातृभाषा कहा जाता है, इसका मतलब पूरी दुनिया में पिता को कभी बोलने का मौका नहीं मिलता।
इसीलिए बाबा इलाहाबादी कहते हैं कि मानव जीवन सर्वाधिक मादक और उत्तेजक होता है।
एक बच्चे का जन्म आपको अभिभावक बनाता है तो दूसरे बच्चे का रेफरी।
पद और पोजिशन, ग्रुप सेक्स की तरह होता है। आपके पीछे 10 लोग आपकी जगह लेने को तैयार खड़े रहते हैं।
विवाह ऐसा संबंध हैं, जिसमें एक व्यक्ति हमेशा सही होता है और दूसरा पति होता है।
शिक्षा, वेश्या की तरह होती है। यह पैसा और कड़ी मेहनत दोनों मांगती है।
आप प्यार खरीद नहीं सकते, फिर भी आपको इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है।
सफलता, गर्भ धारण जैसी होती है। आपको सभी बधाई देते हैं लेकिन यह कोई नहीं पूछता कि इसके लिए आप कितने लुटे- पिटे।
वैवाहिक जीवन में पति और पत्नी दोनों को समझौता करना पड़ता है, पति को हमेशा मानना पड़ता है कि वह गलत है और पत्नी को हमेशा पति की इस बात पर हां कहना पड़ता है।
भाषा को सारी दुनिया में मातृभाषा कहा जाता है, इसका मतलब पूरी दुनिया में पिता को कभी बोलने का मौका नहीं मिलता।
इसीलिए बाबा इलाहाबादी कहते हैं कि मानव जीवन सर्वाधिक मादक और उत्तेजक होता है।
Sunday, April 10, 2011
सपने में देखा सपनी...
बीती रात सपनों में खोया था, तभी एक सपनी आ गई। सपनी में पहले तो बॉबी फिल्म का गीत हम तुम जंगल से गुजरें और शेर आ जाए, सुनाई पड़ा। इसके बाद जो दिखाई पड़ा वह रोमांचित करने वाला और यादगार था। बियाबान जंगल हैं। अंधेरी रात है। सिर से सिर जोडक़र पेड़ इस तरह खड़े हैं कि आकाश का एक भी तारा नहीं दिख रहा। रास्ता सूझ नहीं रहा। उजाले पर रोक है। शांति इतनी कि अपनी बातचीत भी शोर लगे। नीरवता भयावह हो उठी। खामोशी खाने को दौड़ रही। थोड़ी सी भी आवाज शरीर को थरथरा देती। डर से भरे पूरे माहौल में किसी भी तरफ से बाघ, तेंदुए से लेकर लोमड़ी और लकड़बग्घे के निकलकर सामने आ जाने का खतरा।
पूरी सपनी में हम ऐसे ही भयमिश्रित रोमांच से गुजरे। हम किसी हॉरर फिल्म की शूटिंग नहीं देख रहे थे। ना ही किसी सस्पेन्स में फंसे थे। हम सरिस्का अभ्यारण्य में थे। यह बात अलग है कि हम जहां थे, वह किसी हॉरर या सस्पेन्स फिल्म की शूटिंग के लिए उपयुक्त जगह थी। सरिस्का में हम बाघ देखने गए थे। बाघ की लोकेशन जानने के लिए हमारे साथ एंटीना था। दिन में हम खुली जिप्सी में घूमते रहे। रात को हमने बोलेरो ले ली। जंगल दिन में जितने खूबसूरत होते हैं, रात में उतने ही भयावह। यह सच उसी रात हमने जाना। जरा सी सरसराहट पर हम चौंक पड़ते और देखते गाड़ी के अगल-बगल भागती लोमडिय़ां और लकड़बग्घे।
रात हमने एक वन चौकी पर गुजारी। दो पहाडिय़ों के बीच एक झील और झील के किनारे बनी तीन मंजिली पत्थर की पुरानी इमारत। महाराजा जयसिंह की शिकारगाह। अब वन विभाग की सुरक्षा चौकी। किसी भुतहा किले जैसी। महज तीन वनकर्मियों वाली। रहस्यपूर्ण और खामोश। वन चौकी तक पहुंचने के लिए पहाड़ को काट कर बनाई गई चौड़ी सीढिय़ां। झील की तरफ बने इमारत के खुले छज्जे और छत। इन्हीं से कभी जानवरों का शिकार किया जाता था, आज यहीं से जानवरों की गतिविधियों पर नजर रखी जाती है। जंगल के जानवर दूर-दूर से पानी पीने यहां आते हैं। इसीलिए महाराजा जयसिंह से लेकर बाघ और तेंदुओं तक के लिए यह आदर्श शिकारगाह रही। झील के बीच बेतरतीबी से खड़े खजूर के पेड़ जल पक्षियों के आश्रय स्थल। खजूर के इन पेड़ों पर पक्षी विश्राम भी करते हैं और यहीं से मछलियों का शिकार भी। कुल मिलाकर शिकार और शिकारी दोनों के लिए आदर्श जगह।
बाघ की तलाश में हम दिन में खुली जिप्सी में जंगल में घूमे। हिरण, बारहसिंघा, चीतल, नीलगाय, लोमड़ी, लकड़बग्घे, साही, बंदर, लंगूर, मोर, तीतर, बटेर, तोते और ना जाने कितने जानवर और पक्षी हमने देखे, लेकिन नहीं दिखा तो सिर्फ वह जिसे हम देखने गए थे। शाम होने पर हमने बोलेरो ले ली। विशेष डिजाइन वाली इस गाड़ी के पीछे खुली जगह थी, जहां एंटीना लिए वनकर्मी खड़े हो गए। वे लगातार एसटी-2, एसटी-4 और 5 की टोह ले रहे थे। उनकी लोकेशन देख रहे थे। किसी बाघ की लोकेशन नहीं मिली। रात ज्यादा होने पर हमने सोचा बाघ तो अब दिखेगा नहीं, एक बार एंटीना की बीप ही सुन ली जाए। हम जंगल में भटकते हुए बाघ तलाशते रहे और बाघ गुफा में घुसकर आराम से सोते रहे। गुफा इसलिए कह रहे हैं कि वनकर्मियों ने हमें यही बताया कि गुफा के भीतर चले जाने पर बाघों के रेडियो कॉलर संकेत नहीं दे पाते।
अंत में थक हारकर हम वनचौकी आ गए। वनकर्मियों ने चूल्हे पर हाथ से बनी मोटी-मोटी रोटियां खिलाईं। अद्भुत स्वाद वाली लहसुन- टमाटर की चटनी के साथ। तीसरी मंजिल के कमरे में हम सोने गए। चूंकि, पूरा भवन पहाड़ी पर है, इसलिए तीसरी मंजिल के कमरे भी पहाड़ी के कुछ हिस्सों से जुड़ते हैं। इसलिए हमें निर्देश मिला कि हम खिडक़ी-दरवाजे अच्छी तरह से बंद करके ही सोएं। कुछ देर अंधेरे से रोमांस करने के बाद हम सो गए। अगली सुबह हमारी आंख जल्दी खुल गई। हमने खिडक़ी खोलकर देखा तो सुबह सचमुच रोमेंटिक थी। सामने की पहाड़ी पर उगते सूरज की हल्की लालिमा बिखरी थी। नीचे झील से मदिधम उजाले में हल्का-हल्का कोहरा उठ रहा था। पेड़ों के बगल से गुजरती हवा उन्हें गुदगुदा रही थी। पेड़ रह रहकर सिहर उठते।
अद्भुत रूप से खूबसूरत प्रकृति हमारे सामने थी। ओस से भीगी। मस्ती में डूबी। रससिक्त। मादक और अल्हड़। जागकर अलसाई नवपरिणीता सी। आनंदमयी और अनुपम। मोहक उड़ानों और किलोलों से रूपगर्विता को खुश करते पक्षी। कलरव में प्रणय गीत गाते हुए। भावविभोर हम। आश्चर्यचकित। रात में जो भयावह लग रही थी, सुबह अलौकिक सौंदर्य से भरी थी। रूप की रानी थी। प्रकृति के स्वर्गिक सुख में डूबे हमारी तंद्रा तब भंग हुई, जब साथी वनकर्मी ने कहा- सर, बकरी के दूध की चाय है। पी लीजिए। यहां और किसी का दूध नहीं मिलता। हम लौटने की तैयारी में जुट गए। जीवन में कभी न भूल सकने वाली रात और सुबह हमारे दिलोदिमाग पर छा चुकी थी। हमारी सपनी खतम हो चुकी थी।
नीचे सपनी के कुछ चित्र आप भी देखिए।
पूरी सपनी में हम ऐसे ही भयमिश्रित रोमांच से गुजरे। हम किसी हॉरर फिल्म की शूटिंग नहीं देख रहे थे। ना ही किसी सस्पेन्स में फंसे थे। हम सरिस्का अभ्यारण्य में थे। यह बात अलग है कि हम जहां थे, वह किसी हॉरर या सस्पेन्स फिल्म की शूटिंग के लिए उपयुक्त जगह थी। सरिस्का में हम बाघ देखने गए थे। बाघ की लोकेशन जानने के लिए हमारे साथ एंटीना था। दिन में हम खुली जिप्सी में घूमते रहे। रात को हमने बोलेरो ले ली। जंगल दिन में जितने खूबसूरत होते हैं, रात में उतने ही भयावह। यह सच उसी रात हमने जाना। जरा सी सरसराहट पर हम चौंक पड़ते और देखते गाड़ी के अगल-बगल भागती लोमडिय़ां और लकड़बग्घे।
रात हमने एक वन चौकी पर गुजारी। दो पहाडिय़ों के बीच एक झील और झील के किनारे बनी तीन मंजिली पत्थर की पुरानी इमारत। महाराजा जयसिंह की शिकारगाह। अब वन विभाग की सुरक्षा चौकी। किसी भुतहा किले जैसी। महज तीन वनकर्मियों वाली। रहस्यपूर्ण और खामोश। वन चौकी तक पहुंचने के लिए पहाड़ को काट कर बनाई गई चौड़ी सीढिय़ां। झील की तरफ बने इमारत के खुले छज्जे और छत। इन्हीं से कभी जानवरों का शिकार किया जाता था, आज यहीं से जानवरों की गतिविधियों पर नजर रखी जाती है। जंगल के जानवर दूर-दूर से पानी पीने यहां आते हैं। इसीलिए महाराजा जयसिंह से लेकर बाघ और तेंदुओं तक के लिए यह आदर्श शिकारगाह रही। झील के बीच बेतरतीबी से खड़े खजूर के पेड़ जल पक्षियों के आश्रय स्थल। खजूर के इन पेड़ों पर पक्षी विश्राम भी करते हैं और यहीं से मछलियों का शिकार भी। कुल मिलाकर शिकार और शिकारी दोनों के लिए आदर्श जगह।
बाघ की तलाश में हम दिन में खुली जिप्सी में जंगल में घूमे। हिरण, बारहसिंघा, चीतल, नीलगाय, लोमड़ी, लकड़बग्घे, साही, बंदर, लंगूर, मोर, तीतर, बटेर, तोते और ना जाने कितने जानवर और पक्षी हमने देखे, लेकिन नहीं दिखा तो सिर्फ वह जिसे हम देखने गए थे। शाम होने पर हमने बोलेरो ले ली। विशेष डिजाइन वाली इस गाड़ी के पीछे खुली जगह थी, जहां एंटीना लिए वनकर्मी खड़े हो गए। वे लगातार एसटी-2, एसटी-4 और 5 की टोह ले रहे थे। उनकी लोकेशन देख रहे थे। किसी बाघ की लोकेशन नहीं मिली। रात ज्यादा होने पर हमने सोचा बाघ तो अब दिखेगा नहीं, एक बार एंटीना की बीप ही सुन ली जाए। हम जंगल में भटकते हुए बाघ तलाशते रहे और बाघ गुफा में घुसकर आराम से सोते रहे। गुफा इसलिए कह रहे हैं कि वनकर्मियों ने हमें यही बताया कि गुफा के भीतर चले जाने पर बाघों के रेडियो कॉलर संकेत नहीं दे पाते।
अंत में थक हारकर हम वनचौकी आ गए। वनकर्मियों ने चूल्हे पर हाथ से बनी मोटी-मोटी रोटियां खिलाईं। अद्भुत स्वाद वाली लहसुन- टमाटर की चटनी के साथ। तीसरी मंजिल के कमरे में हम सोने गए। चूंकि, पूरा भवन पहाड़ी पर है, इसलिए तीसरी मंजिल के कमरे भी पहाड़ी के कुछ हिस्सों से जुड़ते हैं। इसलिए हमें निर्देश मिला कि हम खिडक़ी-दरवाजे अच्छी तरह से बंद करके ही सोएं। कुछ देर अंधेरे से रोमांस करने के बाद हम सो गए। अगली सुबह हमारी आंख जल्दी खुल गई। हमने खिडक़ी खोलकर देखा तो सुबह सचमुच रोमेंटिक थी। सामने की पहाड़ी पर उगते सूरज की हल्की लालिमा बिखरी थी। नीचे झील से मदिधम उजाले में हल्का-हल्का कोहरा उठ रहा था। पेड़ों के बगल से गुजरती हवा उन्हें गुदगुदा रही थी। पेड़ रह रहकर सिहर उठते।
अद्भुत रूप से खूबसूरत प्रकृति हमारे सामने थी। ओस से भीगी। मस्ती में डूबी। रससिक्त। मादक और अल्हड़। जागकर अलसाई नवपरिणीता सी। आनंदमयी और अनुपम। मोहक उड़ानों और किलोलों से रूपगर्विता को खुश करते पक्षी। कलरव में प्रणय गीत गाते हुए। भावविभोर हम। आश्चर्यचकित। रात में जो भयावह लग रही थी, सुबह अलौकिक सौंदर्य से भरी थी। रूप की रानी थी। प्रकृति के स्वर्गिक सुख में डूबे हमारी तंद्रा तब भंग हुई, जब साथी वनकर्मी ने कहा- सर, बकरी के दूध की चाय है। पी लीजिए। यहां और किसी का दूध नहीं मिलता। हम लौटने की तैयारी में जुट गए। जीवन में कभी न भूल सकने वाली रात और सुबह हमारे दिलोदिमाग पर छा चुकी थी। हमारी सपनी खतम हो चुकी थी।
नीचे सपनी के कुछ चित्र आप भी देखिए।
Sunday, February 27, 2011
परिंदों का स्वर्ग घना
ईश्वर ने फूलों और परिंदों के रूप में हमें अद्भुत तोहफे दे रखे हैं। इन्हीं से हमारी दुनिया खूबसूरत है। रंगीन है। सुरभित और जीवंत है। हमारी भावनाएं और अभिव्यक्तियां सजीव हैं। हमारी दुनिया रंग और रूप से सजी है। ये नहीं रहे तो हमारी दुनिया ही बेरौनक नहीं होगी, हमारी संस्कृति भी जीवंतता खो बैठेगी। लोक जीवन सूनेपन से भर जाएगा। कबूतर, कोयल, बुलबुल, मोर और चकोर को लेकर रचे गए हमारे असंख्य गीत बेमानी हो जाएंगे। दुखद यह है कि हम अपने में इतना उलझ गए हैं कि हमें आसपास रंग-रूप खोती अपनी दुनिया नहीं दिख रही है। विकास की दौड़ में हम अपने आसपास की बेरौनक, बेरंग और बेनूर होती दुनिया नहीं देख पा रहे हैं। हमने निरीह और निर्दोष परिंदों का बसेरा और खाना दोनों छीन लिया है। नतीजतन, बेजुबान परिंदे अपनी इन बुनियादी जरूरतों के लिए किसी से गिला शिकवा किए बिना दुनिया से विदा हो रहे हैं।
यह अहसास तब और घना हो जाता है, जब आप किसी पक्षी विहार में जाते हैं। पक्षियों का कलरव, उनकी खूबसूरती, उनके क्रिया कलाप, उनकी उड़ान, उनके खेल, उनकी मस्ती देखकर आप प्रकृति की खूबसूरती पर मुग्ध हो उठते हैं। प्रकृति के अद्भुत चितेरे की प्रतिभा के कायल हो जाते हैं। आपको लगता है कि इनमें से अधिकांश पक्षियों को आप जानते हैं। इनकी चारित्रिक विशेषताओं के बारे में आपको पता है, लेकिन इन्हें कब देखा था, यह याद नहीं आता। दरअसल, हमारा किताबी ज्ञान, हमारे प्रकृति प्रेम से मिलकर हमें जानकारी देने लगता है, जबकि हमने लंबे समय से इन्हें देखा नहीं होता।
पिछले दिनों हम केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान गए। झीलों और घने वृक्षों से कभी यह उद्यान इतना भरा था कि इसका नाम ही घना (यानी सघन) पड़ गया। बोलचाल में इसे घना पक्षी विहार ही कहते हैं। राजस्थान के भरतपुर जिले में स्थित यह उद्यान प्रवासी पक्षियों का स्वर्ग है। रूस, चीन, श्रीलंका से लेकर हिमालय तक के पक्षी यहां प्रजनन हेतु आते हैं। देश के अन्य हिस्सों से भी आए पक्षियों की यहां भरमार रहती है। प्रवासी पक्षी दिसंबर- जनवरी में प्रजनन करके मार्च तक बच्चों के साथ वापस लौट जाते हैं। प्रवासी पक्षियों के लौटने के बाद देशी पक्षियों का प्रजनन काल शुरू होता है। देशी पक्षी मार्च-अप्रैल में प्रजनन करते हैं। जाड़ों में यहां पक्षियों की 370 प्रजातियां मिलती हैं। यानी भारतीय पक्षियों की कुल 1300 प्रजातियों में से लगभग एक तिहाई।
इस शानदार पक्षी विहार में देशी कम विदेशी पर्यटक ज्यादा आते हैं। पक्षियों की दिनचर्या में बाधा नहीं पड़े, इसके लिए यहां साइकिल, रिक्शा और बैटरी चालित गाड़ी से ही घूमने की अनुमति है। दूर झील में और पेड़ों पर बैठे पक्षियों को सुगमता से देखने के लिए दुरबीन की व्यवस्था यहां हो जाती है। दुरबीन से जब आप किसी पक्षी को देखते हैं तो पक्षी की गतिविधियां, उसके पंखों का रंग, रंगों के शेड्स आपको ऐसे बांधते हैं कि आप देर तक टकटकी लगाए उसे ही देखते रह जाते हैं। बैटरी चालित गाड़ी से घूमते हुए हम सैकड़ों पक्षियों के पारिवारिक प्रेम के साक्षी बने। उनके किलोल, उनकी रूपगर्विता, उनके नृत्य, उनके आहार-विहार, बच्चों के लालन-पालन के प्रति उनकी सजगता, उनके उत्तरदायित्व, परिवार के प्रति उनके समर्पण ने हमें मोहा।
घना पक्षी विहार में हम लोगों के लिए एक और बात विशेष महत्व की रही। सुबह पक्षी देखने के लिए हमने जंगल के भीतर बने गेस्ट हाउस में रात गुजारी। वन कर्मियों ने हमें बताया कि हम जिस विश्राम कक्ष में रुके हैं, उसमें पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी रात्रि विश्राम कर चुकी हैं। यही नहीं, इसी कक्ष में फिल्म अभिनेत्री रेखा भी रात गुजार चुकी हैं। रेखा एक फिल्म की शूटिंग के दौरान घना अभ्यारण्य आईं थीं। वन कर्मियों की बात सुनकर हमें थोड़ा रोमांच हुआ, लेकिन बहुत जल्दी ही हम यह बात भूल गए। कारण, जिस रात हम घना में थे, उस रात पूरा जंगल दूधिया चांदनी में नहाया हुआ था। पूर्णिमा की चांदनी में पूरा जंगल अद्भुत रूप से सुंदर लग रहा था। गेस्ट हाउस के लॉन में हम देर रात तक पूर्ण चांद (फुल मून) का आनंद लेते रहे।
प्रकृति और पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता उत्पन्न करने के लिए यहां प्रख्यात पक्षी प्रेमी सलीम अली की स्मृति में विजिटर एन्टरप्रेटेशन सेंटर खोला गया है। सेंटर का मुख्य आकर्षण पारे का बना भारतीय सारस का एक खूबसूरत जोड़ा है। साठ लाख रुपए की लागत वाला यह जोड़ा भारतीय सारस की खूबसूरती ही नहीं उसके पारिवारिक प्रेम और निष्ठा को भी बताता है। सेंटर में पानी और झीलों का महत्व, घना आने वाले पक्षियों के रूट आदि को भी दर्शाया गया है। आसपास के स्कूली बच्चे यहां अक्सर आते हैं और चिडिय़ों के बारे में जानकारियां हासिल करते हैं। बच्चों के जरिए सेंटर कोशिश करता है कि प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता बचपन से ही व्यक्ति में आए।
प्रकृति के प्रति बच्चों को संवेदनशील बनाना अच्छा प्रयास है, लेकिन इसके परिणाम भविष्य में मिलेंगे। संकट आज खड़ा है। हमारे संसार से जिस तरह पक्षी विलुप्त हो रहे हैं, उसे देखते हुए हमें अपने उत्तरदायित्व को समझना होगा। संवेदनशीलता दिखानी होगी। अन्यथा बच्चों के बड़े होने तक पक्षी बचेंगे ही नहीं। चूंकि इस संकट के हम जिम्मेदार हैं, इसलिए हमें ही सोचना होगा। प्रयास करना होगा। परिंदों के दाना-पानी की ही नहीं, उनके बसेरों के बारे में भी चिंता करनी होगी। अपने जीवन में परिंदों को जगह देनी होगी। परिंदों को बचाने की दिशा में किया गया हमारा प्रयास पर्यावरण संतुलित तो करेगा ही, हमारे अपने सौंदर्यबोध और मानवीयता को भी दर्शाएगा। हम अपने बच्चों को विरासत में एक खूबसूरत और रंगीन दुनिया देकर जाएंगे। परिंदों को बचाने के प्रयासों से हम न केवल अपनी भूल सुधार सकेंगे, अपितु अपनी आकर्षक दुनिया की खूबसूरती भी बचा सकेंगे। सबसे बड़ी बात यह कि हमारी यह कोशिश उस अद्भुत चित्रकार के प्रति हमारा एक विनम्र आभार भी प्रदर्शित करेगी, जिसने इतनी खूबसूरत, रंगबिरंगी और जीवंत सृष्टि रचकर हमें मुफ्त में दी है।
नीचे घना पक्षी विहार के कुछ चित्र आप भी देखिए :-
यह अहसास तब और घना हो जाता है, जब आप किसी पक्षी विहार में जाते हैं। पक्षियों का कलरव, उनकी खूबसूरती, उनके क्रिया कलाप, उनकी उड़ान, उनके खेल, उनकी मस्ती देखकर आप प्रकृति की खूबसूरती पर मुग्ध हो उठते हैं। प्रकृति के अद्भुत चितेरे की प्रतिभा के कायल हो जाते हैं। आपको लगता है कि इनमें से अधिकांश पक्षियों को आप जानते हैं। इनकी चारित्रिक विशेषताओं के बारे में आपको पता है, लेकिन इन्हें कब देखा था, यह याद नहीं आता। दरअसल, हमारा किताबी ज्ञान, हमारे प्रकृति प्रेम से मिलकर हमें जानकारी देने लगता है, जबकि हमने लंबे समय से इन्हें देखा नहीं होता।
पिछले दिनों हम केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान गए। झीलों और घने वृक्षों से कभी यह उद्यान इतना भरा था कि इसका नाम ही घना (यानी सघन) पड़ गया। बोलचाल में इसे घना पक्षी विहार ही कहते हैं। राजस्थान के भरतपुर जिले में स्थित यह उद्यान प्रवासी पक्षियों का स्वर्ग है। रूस, चीन, श्रीलंका से लेकर हिमालय तक के पक्षी यहां प्रजनन हेतु आते हैं। देश के अन्य हिस्सों से भी आए पक्षियों की यहां भरमार रहती है। प्रवासी पक्षी दिसंबर- जनवरी में प्रजनन करके मार्च तक बच्चों के साथ वापस लौट जाते हैं। प्रवासी पक्षियों के लौटने के बाद देशी पक्षियों का प्रजनन काल शुरू होता है। देशी पक्षी मार्च-अप्रैल में प्रजनन करते हैं। जाड़ों में यहां पक्षियों की 370 प्रजातियां मिलती हैं। यानी भारतीय पक्षियों की कुल 1300 प्रजातियों में से लगभग एक तिहाई।
इस शानदार पक्षी विहार में देशी कम विदेशी पर्यटक ज्यादा आते हैं। पक्षियों की दिनचर्या में बाधा नहीं पड़े, इसके लिए यहां साइकिल, रिक्शा और बैटरी चालित गाड़ी से ही घूमने की अनुमति है। दूर झील में और पेड़ों पर बैठे पक्षियों को सुगमता से देखने के लिए दुरबीन की व्यवस्था यहां हो जाती है। दुरबीन से जब आप किसी पक्षी को देखते हैं तो पक्षी की गतिविधियां, उसके पंखों का रंग, रंगों के शेड्स आपको ऐसे बांधते हैं कि आप देर तक टकटकी लगाए उसे ही देखते रह जाते हैं। बैटरी चालित गाड़ी से घूमते हुए हम सैकड़ों पक्षियों के पारिवारिक प्रेम के साक्षी बने। उनके किलोल, उनकी रूपगर्विता, उनके नृत्य, उनके आहार-विहार, बच्चों के लालन-पालन के प्रति उनकी सजगता, उनके उत्तरदायित्व, परिवार के प्रति उनके समर्पण ने हमें मोहा।
घना पक्षी विहार में हम लोगों के लिए एक और बात विशेष महत्व की रही। सुबह पक्षी देखने के लिए हमने जंगल के भीतर बने गेस्ट हाउस में रात गुजारी। वन कर्मियों ने हमें बताया कि हम जिस विश्राम कक्ष में रुके हैं, उसमें पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी रात्रि विश्राम कर चुकी हैं। यही नहीं, इसी कक्ष में फिल्म अभिनेत्री रेखा भी रात गुजार चुकी हैं। रेखा एक फिल्म की शूटिंग के दौरान घना अभ्यारण्य आईं थीं। वन कर्मियों की बात सुनकर हमें थोड़ा रोमांच हुआ, लेकिन बहुत जल्दी ही हम यह बात भूल गए। कारण, जिस रात हम घना में थे, उस रात पूरा जंगल दूधिया चांदनी में नहाया हुआ था। पूर्णिमा की चांदनी में पूरा जंगल अद्भुत रूप से सुंदर लग रहा था। गेस्ट हाउस के लॉन में हम देर रात तक पूर्ण चांद (फुल मून) का आनंद लेते रहे।
प्रकृति और पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता उत्पन्न करने के लिए यहां प्रख्यात पक्षी प्रेमी सलीम अली की स्मृति में विजिटर एन्टरप्रेटेशन सेंटर खोला गया है। सेंटर का मुख्य आकर्षण पारे का बना भारतीय सारस का एक खूबसूरत जोड़ा है। साठ लाख रुपए की लागत वाला यह जोड़ा भारतीय सारस की खूबसूरती ही नहीं उसके पारिवारिक प्रेम और निष्ठा को भी बताता है। सेंटर में पानी और झीलों का महत्व, घना आने वाले पक्षियों के रूट आदि को भी दर्शाया गया है। आसपास के स्कूली बच्चे यहां अक्सर आते हैं और चिडिय़ों के बारे में जानकारियां हासिल करते हैं। बच्चों के जरिए सेंटर कोशिश करता है कि प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता बचपन से ही व्यक्ति में आए।
प्रकृति के प्रति बच्चों को संवेदनशील बनाना अच्छा प्रयास है, लेकिन इसके परिणाम भविष्य में मिलेंगे। संकट आज खड़ा है। हमारे संसार से जिस तरह पक्षी विलुप्त हो रहे हैं, उसे देखते हुए हमें अपने उत्तरदायित्व को समझना होगा। संवेदनशीलता दिखानी होगी। अन्यथा बच्चों के बड़े होने तक पक्षी बचेंगे ही नहीं। चूंकि इस संकट के हम जिम्मेदार हैं, इसलिए हमें ही सोचना होगा। प्रयास करना होगा। परिंदों के दाना-पानी की ही नहीं, उनके बसेरों के बारे में भी चिंता करनी होगी। अपने जीवन में परिंदों को जगह देनी होगी। परिंदों को बचाने की दिशा में किया गया हमारा प्रयास पर्यावरण संतुलित तो करेगा ही, हमारे अपने सौंदर्यबोध और मानवीयता को भी दर्शाएगा। हम अपने बच्चों को विरासत में एक खूबसूरत और रंगीन दुनिया देकर जाएंगे। परिंदों को बचाने के प्रयासों से हम न केवल अपनी भूल सुधार सकेंगे, अपितु अपनी आकर्षक दुनिया की खूबसूरती भी बचा सकेंगे। सबसे बड़ी बात यह कि हमारी यह कोशिश उस अद्भुत चित्रकार के प्रति हमारा एक विनम्र आभार भी प्रदर्शित करेगी, जिसने इतनी खूबसूरत, रंगबिरंगी और जीवंत सृष्टि रचकर हमें मुफ्त में दी है।
नीचे घना पक्षी विहार के कुछ चित्र आप भी देखिए :-
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