Tuesday, July 5, 2011

व्यवस्था हो तो गुजरात जैसी

क्या बड़े सामाजिक हितों के लिए लोग अपने छोटे हितों की कुर्बानी देने में संकोच करते हैं? क्या लोग अपना छोटा नुकसान समाज के बड़े लाभ से बड़ा मानते हैंं? यदि आपका उत्तर, हां, है तो आपको गुजरात जाकर आम गुजरातियों से इसका उत्तर पूछना चाहिए। गुजरात एक ऐसा प्रदेश है, जहां की सडक़ें ही चौड़ी, सपाट और खुली- खुली नहीं हैं, वहां के मंदिर भी देश के अन्य हिस्सों के मंदिरों से ज्यादा साफ सुथरे और खुलेपन से भरे हैं। मंदिरों के आगे कोई अतिक्रमण नहीं। हर मंदिर के सामने साथ सुथरा खुला मैदान। आसपास गंदगी और बदबू नहीं। पंडों पुजारियों की लूट खसोट नहीं। इत्मीनान से पूरा गुजरात घूमिए। मंदिरों के दर्शन कीजिए और बिना लुटे पिटे मुस्कुराते हुए घर लौट आइए।

पिछले दिनों हम सपरिवार गुजरात गए। हमारी मुख्य यात्रा अहमदाबाद से जूनागढ़, सोमनाथ, पोरबंदर, द्वारिका, जामनगर होते हुए साबरमती आश्रम तक रही। इस दौरान हमने दो ज्योर्तिलिंग सोमनाथ और नागेश्वर महादेव मंदिर के दर्शन किए। द्वारिका में द्वारिकाधीश मंदिर के अलावा रुकमणि माता का मंदिर देखा। डाकोर में रणछोड़दास जी के मंदिर के दर्शन किए। पोरबंदर में गांधी जी का जन्मस्थान और पैतृक भवन देखा। साबरमती में बापू के आश्रम का अवलोकन किया। हर जगह खुले मैदान के अंतिम भाग में मुख्य भवन। हर मंदिर में आराम से पूजा अर्चना। कहीं कोई भागा दौड़ी नहीं। ठगहाई नहीं। गुजरात में हमने टैक्सी से 2 हजार किलोमीटर से अधिक यात्रा की। एक सप्ताह की गुजरात यात्रा करके जब हम घर लौटे तो हमारे पास उत्तर और दक्षिण भारत के मंदिरों के पंडों पुजारियों की नोचने खसोटने और मंदिरों के आसपास बजबजाती गंदगी जैसी कोई कहानी सुनाने के लिए नहीं थी।

परिवार के साथ मैंने देश के लगभग हर प्रांत का भ्रमण किया है। दर्शनीय स्थल देखें हैं। मंदिरों में पूजा अर्चना की है। पहाड़, झरने, झील, नदियों, उनके उदगम, समुद्र और किलों का आनंद लिया है। देश के दुर्गम तीर्थों में शामिल हेमकुंड साहिब तक हम गए हैं। हम हर जगह अव्यवस्थाओं से क्षुब्ध हुए हैं। इसलिए गुजरात यात्रा के बाद मैं कह सकता हूं कि देश में मंदिरों की व्यवस्थाएं गुजरात जैसी ही होनी चाहिए। अपनी घुमक्कड़ी प्रवृत्ति से कई जगह तो हम इतना दुखी हुए कि हमने वहां दोबारा नहीं जाने की घोषणा तक कर डाली। मेरा परिवार दूसरों को भी समझाता है कि वहां कभी मत जाइए। इसमें सबसे ऊपर नाम तिरुपति के बालाजी मंदिर का है। मंदिरों के इर्द-गिर्द फैली गंदगी, मंदिर तक पहुंचने के दौरान पंडों पुजारियों, फूलमाला तथा प्रसाद बेचने वालों की कारगुजारियां, ऐसी होती हैं कि आप श्रद्धा की जगह आक्रोश से भर उठते हैं।

देश में आए दिन नए- नए मंदिर बनते जा रहे हैं। इसके बावजूद लोगों की आस्था पुराने मंदिरों में ही है। मेरे जैसे तमाम लोगों को प्राचीन मंदिरों का शिल्प अपनी ओर खींचता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोगों की आस्था के केन्द्र प्राचीन मंदिरों की दुर्दशा और उनमें जारी लूट खसोट पर कोई हिन्दू संगठन कुछ नहीं करता। सरकारों को तो खैर, जनआस्था से कोई लेना-देना ही नहीं होता। श्रद्धालु हिन्दू प्राचीन मंदिरों में जाकर लुटता- पिटता है और हिन्दू बने रहने का अभिशाप ढोता है। गुजरात के मंदिरों में प्रसाद की भी निजी दुकानें आपको नहीं मिलेंगी। मंदिर ट्रस्ट में ही आप पैसा जमाकर रसीद लीजिए और वहीं से आपको भगवान का भोग मिल जाएगा।

गुजरात की सडक़ों पर गाड़ी से चलना सुखद और आनंददायी अनुभव है। पूरे गुजरात में फोर लेन, सिक्स लेन सडक़ों का जाल है। यह सडक़ें शहर के बाहर ही नहीं, शहर के भीतर तक हैं। हमें आश्चर्य तो तब हुआ जब हम अहमदाबाद जैसे बड़े और पुराने शहर में घूमे। अहमदाबाद शहर के भीतर सिक्स लेन सडक़ें हैं। दो लेन आने, दो लेन जाने और बीच की दो लेन सिटी बस के लिए रिजर्व। सोचना कठिन है कि हजारों साल पुराने और इतने बड़े शहर के भीतर 6 लेन की व्यवस्था। कमोबेश, यही स्थिति जूनागढ़ शहर की। पूरा जूनागढ़ शहर फोर लेन सडक़ से भरा। सडक़ें चिकनी और सपाट। टूट-फूट और गड्ढों से दूर। किसी शहर के भीतर से गुजरिए या बाई पास से। नेशनल हाईवे पर चलिए या स्टेट हाईवे से। सब जगह सरसराती चलती है गाड़ी। कोई हचका नहीं। कोई झटका नहीं।

जाहिर है, इन सब कामों के लिए तमाम लोगों के घरों- दुकानों को तोड़ा गया होगा। तमाम लोगों की जमीन अधिगृहीत की गई होगी। लोगों के धंधे चौपट हुए होंगे। सार्वजनिक हितों के लिए लोगों को निजी नुकसान उठाना पड़ा होगा। लोग नाराज हुए होंगे। मंदिरों के पास धर्म के नाम पर लूट खसोट करने वाले मरने मारने पर उतर आए होंगे। जनआस्था से खिलवाड़ करके सीधे सरल हिन्दुओं को ठगने वाले बदले की भावना से भर गए होंगे। आश्चर्य, गुजरात में ऐसी कोई स्थिति नहीं बनी। कुछ खास नहीं हुआ। गुजरात पहुंचने वाला आम हिन्दुस्तानी आज जितना खुश होता है, उतना ही आम गुजराती खुश है। मैंने कई जगह लोगों से इस मुद्दे पर बात की। हर गुजराती का यही कहना था कि तोड़-फोड़ से नुकसान हुआ तो नए निर्माण का लाभ भी मिला। लाभ- हानि का आकलन करें तो आम गुजरातियों को इससे फायदा ही हुआ है। पर्यटन बढ़ा है। उद्योग और व्यवसाय बढ़ा है। यातायात बढ़ा है। सुविधाएं बढ़ी हैं। कुल मिलाकर सरकार के साथ आम लोगों की भी आय बढ़ी है। इसलिए आम गुजराती नए आधुनिक युग की सुविधाओं का आनंद ले रहा है।

गुजरात यात्रा के कुछ चित्र नीचे आप भी देखिए। पुनश्च, मुझे ब्लॉग पर आलेख के साथ फोटो डालना और उनका कैप्शन लिखना अभी नहीं आता, इसलिए नीचे पड़े चित्र गुजरात यात्रा के समझिए।

2 comments:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

अच्छा लगा जानकर ....यह सभी राज्यों के अनुकरणीय है....

mera anubhav said...

जी सर सही कहा आपने।
हाल ही में मै भी गुजरात होकर लौटा हूं, यहां के लोग सामाजिक हितों के खातिर अपने हितों की कुर्बानी देने में कतई पीछे नहीं हटते। यही वजह है कि हाइवे के निर्माण में रास्ते में आ रह कई छोटे बड़े मंदिरों को एक रात के भीतर हटा दिया गया। खास बात यह रही कि जनता ने जरा सा भी विरोध नहीं किया। यहां के मंदिरों और मस्जिदों की शिल्पकारी तो वाकई काबिले तारीफ है।
गुजरात दर्शन कराने के लिए शुक्रिया।